संसद का शीतकालीन सत्र 26 नवंबर से शुरू होगा और 23 दिसंबर तक चलेगा।बिहार चुनाव में भाजपा को हरा कर और पीएम मोदी के विजय रथ को रोक देने के बाद विपक्ष खासकर कांग्रेस पूरी ताकत के साथ सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।यह भी संभव हो कि पिछली बार की तरह इस बार भी शीतलकालीन सत्र को चलाने में सरकार को बाधा हो, यही वजह है कि लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने बाकायदा सांसदों को पत्र लिखकर मर्यादा में रहने की सलाह दी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या बिहार चुनाव में भाजपा की हार से खुश कांग्रेस सभी दलों को साथ मिलाकर सरकार को घेरने के लिए पहले से भी तेज तर्रार तेवर अपनाएगी? क्या यह संभव है कि लोस स्पीकर महाजन जिस मर्यादा की बात कर रही हैं वह पहले से ज्यादा छिन्न भिन्न हो?क्या विपक्ष सरकार के साथ सयोगात्मक रवैया अपनाएगा? क्या जनता के पैसे की बर्बादी रुकेगी और सांसद काम की गंभीरता को समझ पाएंगे? या फिर यह सत्र भी दादरी, असिष्णुता और पुरस्कार वापसी, पाकिस्तान पर सीमा पर संघर्ष विराम जैसे मुद्दों में जाया कर दिया जाएगा? क्या बिहार में भाजपा की हार से खुश कांग्रेस विपक्ष की इस भूमिका को ठीक से निभा पाएगी? क्या विपक्ष के नेता को लेकर संसद के गलियारों में घूम रहे सवालों का सही जवाब मिलेगा? बेशक यह सवाल बड़े हैं, लेकिन बेहद लाजमी हैं। फिर सरकार को भी चाहिए कि वह विपक्ष की बात को गंभीरता से ले और उसके सुझावों पर अमल करे।देखा जाए तो भारत विश्व का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक देश है। स्वस्थ लोकतंत्र भारत की नींव है। हम सभी देशवासी इसके तने व पत्तियां हैं। सशक्त लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष के होने से देश मजबूत होता है। लोकतंत्र अन्य सब शासन प्रणालियों से श्रेष्ठ इसीलिए माना जाता है, जो शासकों की त्रुटियां बतलाता रहता है, उसकी आलोचना करता रहता है। इसका अंकुश और उसके विरोध का भय सत्ता पक्ष शासकों को मनमानी करने से रोकता है, अतः निंदा या आलोचना से रूष्ट या दुखी होने अथवा बदला लेने की बात सोचने की बजाए उसका रचनात्मक उपयोग करना चाहिए, इसी में सबका भला है।
निंदा व आलोचना का उपयोग अपने उत्कर्ष और आत्म-परिष्कार के लिए किया जाता है। अतः निंदा के प्रयास में अपने दुगुर्णों व दोषों को तलाशें और निंदक के प्रति सहिष्णुता बरते। निंदक या आलोचक हमारे प्रछन्न प्रशंसक होते हैं। और हमारे व्यक्तित्व को उजला करते हैं, तभी तो कबीर ने कहा है कि ‘निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय‘। अगर हम विपक्ष की बात करते हैं, तो हमें इतिहास के उन पन्ना को पलटना होगा जिसमें विपक्ष की नींव का अंकन मिलता है। 1950 से लेकर 1964 तक संसद निश्चित तौर पर हमारे लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे जीवंत मंच था।संसदीय प्रणाली के अध्येता आज भी डॉ राममनोहर लोहिया और पं॰ जवाहर लाल नेहरू के बीच होने वाली बहसों को याद करते हैं। 1963 में डॉ राममनोहर लोहिया ने संसद में एक पर्चा बांटा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बतौर प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर प्रतिदिन 25 हजार रूपयों का खर्च आता है, जबकि देश की आम जनता को प्रतिदिन 3 आने की कमाई पर निर्वाह करना पड़ता है।
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