Saturday, 4 March 2017

भयंकर सौर तूफ़ानों का पता लगाने का भारतीय जुगाड़

पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में सौर तूफ़ान के बारे में सनसनीखेज़ वैज्ञानिक खोज का और भारत में बंद पड़ी सोने की ख़दानों में दबे हुए दशकों पुराने, रिसाइकल स्टील पाइप का आपस में क्या संबंध हो सकता है?
बहुत बड़ा संबंध है.
दरअसल, इस तरह के 3,700 से ज़्यादा पाइप एक बहुत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज में उपयोगी साबित हुए हैं.
भारत और जापान के वैज्ञानिकों की एक टीम ने हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय ख़्याति का लेख प्रकाशित किया है जिसमें पृथ्वी के चुंबकीय कवच में सेंध के बाद हुई घटनाएं दर्ज हैं.
तमिलनाडु में एक हिल स्टेशन ऊटी की कॉस्मिक रे प्रयोगशाला में, दुनिया में अपनी तरह के सबसे बड़े दूरबीन, जीआरएपीईएस-3 म्यूऑन (एक उप परमाणु कण) से वैज्ञानिकों ने 22 जून 2015 को वातावरण में छाए रहे आकाशगंगा के ब्रह्मांडीय किरणों के विस्फोट को रिकॉर्ड किया.
चुबंकीय क्षेत्र में सेंध की घटना सूरज से आ रहे आवेशित कणों के तेज़ रफ़्तार से धरती से टकराने के कारण हुई.
इस अध्ययन में शामिल एक वैज्ञानिक डॉ. सुनील गुप्ता के मुताबिक इतने बड़े पैमाने के सौर तूफ़ान उपग्रहों और स्वचलित विमानों को तहस नहस कर सकते हैं और बिजली की भीषण क़िल्लत पैदा कर सकते हैं और हमें दोबारा पाषाण युग में वापस ले जा सकते हैं.
ऊटी में मौजूद दुनिया के सबसे बड़ा और बहुत संवेदनशील ब्रह्मांडीय किरण दूरबीन चार दशक पुराने ज़िंक की परत वाले स्टील पाइप से बने हैं.
विज्ञान पत्रिका साइंस मैगज़ीन के भारत संवाददाता पल्लव बागला ने मुझे बताया, "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है. जब आपके पास नए, क़ीमती चीज़ ख़रीदने के पैसे नहीं होते हैं तो आप लागत कम करने के लिए अपने ख़ुद के उपाय ढूंढते हैं. भारतीय वैज्ञानिकों ने रिसाइकिल करने और ख़ुद के सस्ते समाधान निकालने की कला में महारत हासिल कर ली है."
एक गौर करने वाली मिसाल है. 2014 में भारत के मंगल ग्रह के अभियान में साढ़े चार अरब रूपये का ख़र्च आया, जो अमरीका के मेवेन ऑर्बिटर से लगभग 10 गुना कम था.

6 मीटर लंबे ये पाइप दूरबीन में बतौर सेंसर्स लगाए गए. ये पाइप कर्नाटक के सदियों पुराने कोलार सोने की ख़दानों में क़रीब दो दशकों से दबे हुए थे.
इन पाइप को जापान से आयात किया गया था, जहां इनका इस्तेमाल इमारत बनाने में होता हैं, मकसद था भारतीय और जापानी वैज्ञानिकों की टीम आकाशगंगा और उससे भी आगे ब्रह्मांड के उच्च ऊर्जा के आपस में टकराने के कारण पैदा हुए न्यूट्रॉनो, उप परमाणु कणों की जांच कर सकें.
वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग के लिए इन्हें पृथ्वी में दो किलोमीटर नीचे दबा रखा था.
1990 के दशक में जब सोने की क़ीमतें घाटे के स्तर तक पहुंच गई और ख़दानें बंद होनी शुरू हो गईं तब अधिकारियों ने इन पाइप को हटाकर इन्हें रद्दी में बेचने की योजना बनाई. डॉ. गुप्ता ने मुझे बताया, "हमने कहा कि हम अपने प्रयोगों के लिए इनका दोबारा इस्तेमाल करना चाहते हैं."
आख़िरकार इनमें से करीब 7,500 पाइप को ट्रक के ज़रिये पहाड़ में स्थित 100 एकड़ में फैले प्रयोगशाला के परिसर में ले जाया गया जहां एक आकाशीय खगोल केंद्र भी मौजूद है.
ऊटी में ब्रह्मांडीय किरणों की रिकॉर्डिंग का काम सही मायनों में 1998 में शुरू हुआ जब उच्च ऊर्जा ब्रह्मांडीय किरणों की खोज के लिए वैज्ञानिक इन उपेक्षित पाइपों से म्यूऑन सेंसर बनाने लगे.
आज 3,712 स्टील के ट्यूब 560 वर्ग मीटर की एक इमारत में कंक्रीट की परतों पर रखे हुए हैं जहां दुनिया की सबसे बड़ी ऐसी म्यूऑन दूरबीन है.
दुनिया में ऐसे कई दर्जन दूरबीन मौजूद हैं, लेकिन इनमें इतनी शक्तिशाली कोई भी नहीं जैसी कि ऊटी में है.

No comments:
Write comments

Recommended Posts × +