Monday, 4 July 2016

फराज ने कायम की मिसाल, तारिषी के लिए चुन ली मौत

फराज ने कायम की मिसाल, तारिषी के लिए चुन ली मौत


कहते हैं कि दोस्त वही होता है जो मुश्किल घड़ी में आपके साथ खड़ा रहे, ना कि मुश्किल घड़ी में मुंह मोड़कर दोस्त को मुश्किल में छोड़कर निकल जाए। दोस्ती क्या होती है इसकी मिसाल कायम की है ढाका आतंकी हमले के शिकार तारिषी के दोस्ता फराज़ ने। फराज़ की जान बच सकती थी अगर वो तारिषी का साथ छोड़ देता, लेकिन फराज़ ने ऐसा नहीं किया।ढाका में इंसानियत के दुश्मन और आतंकी जब लोगों को गिन-गिनकर उनका धर्म और उनका नाम पूछकर ज़िंदगी और मौत दे रहे थे उस वक्त फराज़ भी वहां मौजूद था। फराज़ अच्छी तरह से जानता था कि अगर वो कुरान की आयतें सुना देगा तो उसकी जान बच जाएगी, लेकिन उसके सामने उसकी दोस्त की ज़िंदगी मुश्किल में थी और उसने अपनी जान बचाने से पहले तारिषी की जान बचाने की हर संभव कोशिश की। अपनी जान से ज़्यादा उसने अपनी दोस्त को बचाने की अहमियत दी और दोस्ती के नाम पर कुर्बान हो गया। ना मज़हब, ना जात और ना ही क्षेत्र की परवाह फराज़ के लिए सिर्फ इंसानियत ही सबसे ऊपर थी।चश्मदीद के मुताबिक, 20 साल के फराज ने अपनी दोस्त तारिषी और अंबिता के लिए जिंदगी दांव पर लगा दी। आतंकी लोगों की पहचान पूछकर मार रहे थे। बांग्लादेशी होने की वजह से हमलावरों ने फराज को रेस्टोरेंट से जाने को कहा, लेकिन उसने अपने दोनों दोस्तों को छोड़कर जाने से मना कर दिया। 19 साल की तारिषि भारतीय मूल की थी जबकि 19 साल की अंबिता बांग्लादेशी थी, लेकिन वो अमेरिका में पढ़ाई कर रही थी। दोनों उस रात वेस्टर्न आउटफिट पहने थीं। तारिषी, अंबिता और फराज़ इफ्तार के बाद कैफे गए थे। ढाका के शैतानों ने फराज़ से दोनों की पहचान पूछी। फराज़ ने उन्हें बताया कि उनकी दोस्त तारिषी भारतीय मूल की है जबकि अंबिता बांगलादेशी है। जैसे ही दोनों की पहचान का पता चला, आतंकियों ने दोनों को मारने की तैयारी कर ली और फराज़ को छोड़ने की, लेकिन फराज़ ने वहां से हिलने से इनकार कर दिया।

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