मध्यप्रदेश से राज्यसभा की तीसरी सीट पर होगा भाजपा-कांग्रेस में मुकाबलाऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश के विधायकों के अच्छे दिन आ गए हैं या आने वाले हैं। राज्यसभा की मध्यप्रदेश से तीन सीटों के लिए चार उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से यह चुनाव दिलचस्प तो हो ही गया है, विधायकों की खरीद-फरोख्त का भी अवसर दिखने लगा है। दो सीटों पर भाजपा की जीत सुनिश्चित है, क्योंकि इन पर दो ही उम्मीदवार खड़े हुए हैं, दोनो ही पार्टी के हैं और पार्टी के पास जीत के लिए निर्धारित विधायक वोट संख्या भी है। तीसरी सीट पर कांग्रेस के एडवोकेट विवेक तन्खा और भाजपा समर्पित निर्दलीय उम्मीदवार विनोद गोटिया हैं। श्री गोटिया भाजपा के पूर्व महामंत्री हैं।पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के कहने पर पार्टी की राज्य शाखा ने तुरत-फुरत श्री गोटिया का नामांकन दाखिल कराया। कांग्रेस के पास 57 विधायक हैं। उसके उम्मीदवार को जीत के लिए 58 उम्मीदवार चाहिए। यानी उसे 1 विधायक की ओर जरुरत है। कांग्रेस को बसपा के 4 विधायकों पर भरोसा है। जबकि भाजपा के अघोषित विनोद गोटिया के पास वर्तमान में 49 विधायक हैं। उन्हें जीत के लिए 9 वोट चाहिए। भाजपा को 3 निर्दलीय विधायकों के समर्थन की उम्मीद है। इसके अलावा खबरें आ रही हैं कि पार्टी हाईकमान ने बसपा के शीर्ष नेतृत्व से भी बात की है कि मध्यप्रदेश से उनके विधायक विनोद गोटिया को उनकी पार्टी के विधायक वोट दें।राजनीति में सत्ता के पदों के लिए समर्थन और विरोध अब विचारधारा के आधार पर नहीं होता, बल्कि पर्दे के पीछे से इसके लिए सौदेबाजी होती है। इसे अंग्रेजी में ‘होर्स टे्रडिंग‘ कहते हैं। अपने पक्ष में वोट लेने के एवज में विधायक वोटरों को करोड़ों रूपये देने पड़ते हैंभाजपा अब सत्ता में बने रहने और सत्ता पाने के लिए सभी हथकण्डे सीख गई है। इसी विश्वास के तहत पार्टी हाईकमान ने विनोद गोटिया को मैदान में उतारा है, यह जानते हुए भी कि उसके पास पर्याप्त वोटर संख्या बल नहीं है। सभी जानते हैं कि तीनों निर्दलीय विधायक विवेक तन्खा या विनोद गोटिया किसी को यूं ही वोट तो देंगे नहीं। दोनो पक्ष उन्हें ना-ना प्रकार के प्रलोभन देंगे, दे भी रहे होंगे। पहले भी ऐसा ही होता रहा है।बसपा विधायक भले ही अपनी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के निर्देशानुसार वोट देने की बात कह रहे हों, अगर ऐसा है भी तो ऊपर स्तर पर भी खरीद फरोख्त ही होती है। उत्तराखण्ड विधानसभा में हरीश रावत के विश्वास मत के दौरान बसपा ने पक्ष में मतदान किया था, बदले में उसके विधायक को सरकार में मंत्री पद मिला और बहन जी को जो थैली मिलती है वह अलग।मध्यप्रदेश में भाजपा को अपने विधायकों पर तो विश्वास है, लेकिन कांग्रेस को अतीत की घटनाओं को देखते हुए अपने कुछ विधायकों पर अविश्वास हो रहा है कि वे गद्दारी कर सकते हैं, सत्ता पक्ष के प्रलोभन में आ सकते हैं, मोदी-शाह की जोड़ी अपने कांग्रेस मुक्त अभियान को इस राज्यसभा चुनाव में भी साम-दाम-दण्ड -भेद की नीति अपनाकर लागू करना चाहती है।कांग्रेस के अरबपति उम्मीदवार विवेक तन्खा अभी तक सुप्रीम कोर्ट में अपने मुवक्किलों का केस लडऩे के एवज में प्रति सुनवाई लाखों रूपये वसूलते रहे हैं, अब शायद पहली बार उन्हें अपनी तिजोरी खोलनी पड़े। वैसे, पार्टी हाईकमान भी उनके लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है और धन बल की कमी नहीं होने देगा। विधानसभा के चुनाव 2013 में हुए थे। इन तीन सालों में यह पहला मौका होगा जब सत्ता पक्ष और विपक्ष सभी विधायकों की जर्बदस्त पूछपरख हो रही है, उनकी हर सुविधा का ध्यान रखा जा रहा है।
सच कहें तो इन विधायकों के अच्छे दिन आ गए हैं।
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