जन्मदिन विशेष........
भारत रत्न अटल बिहारी बाजपाई.....
नई दिल्ली। भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में कृष्णा देवी और कृष्णा बिहारी वाजपेयी के घर में हुआ था। वह देश के 10वें प्रधानमंत्री थे। 1996 में वह पहले 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री रहे और फिर 1998 से 2004 तक इस पद पर रहे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता वाजपेयी पहले गैर कांग्रेसी नेता थे जिन्होंनें पांच साल प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा किया।
चार दशक से ज्यादा सांसद रहे वाजपेयी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए, जबकि दोर बार ऊपरी सदन राज्यसभा के लिए चुने गए। खराब सेहत के चलते राजनीति से संन्यास लेने वाले वाजपेयी 2009 तक लखनऊ से लोकसभा सांसद रहे। भारतीय जनसंघ को खड़ा करने वालों में से एक थे अटल बिहारी वाजपेयी। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में बनी जनता सरकार में वाजपेयी विदेश मंत्री थे। हालांकि, इस सरकार के गिरने के बाद वाजपेयी ने 1980 में जनसंघ को भारतीय जनता पार्टी के रूप में फिर से खड़ा किया।
पिछले साल उनके जन्मदिन पर भारत के राष्ट्रपति कार्यालय ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न देने की घोषणा की। खराब सेहत के चलते राष्ट्रपति ने खुद 27 मार्च 2015 को उनके निवास पर जाकर उन्हें यह सम्मान सौंपा।
उनके जन्मदिन 24 दिसंबर को केंद्र ने गुड गवर्नस के रूप में मनाने की घोषण की।
उनके जन्मदिन 24 दिसंबर को केंद्र ने गुड गवर्नस के रूप में मनाने की घोषण की।
राजनीति में कदम
वाजपेयी का राजनीति में अनावरणÓ अगस्त 1942 में हुआ था जब भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें और उनके बड़े भाई को गिरफ्तार करके 23 दिनों के लिए जेल में डाल दिया गया। उन्हें जेल से तभी रिहा किया गया जब उन्होंने यह लिखकर दिया कि वह ब्रिटिश विरोधी संघर्ष में हिस्सा नहीं लेंगे। वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ के लिए काम करने के लिए आरएसएस ने दीनदयाल उपाध्याय के साथ वाजपेयी के नाम को आगे किया था। उत्तर क्षेत्र के लिए उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया था। 1954 में कश्मीर में गैर कश्मीरियों के साथ दुव्र्यवहार को लेकर मुखर्जी आमरण अनशन पर बैठे तो वाजपेयी भी उनके साथ थे। इस अनशन के दौरान मुखर्जी ने जेल में दम तोड़ दिया। 1957 में आम चुनावों में वाजपेयी मथुरा से राजा महेंद्र प्रताप से चुनाव हार गए। हालांकि, वह बलरामपुर से चुन लिए गए। उनकी बोलने की कला से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भविष्यवाणी कर दी कि वाजपेयी एक दिन देश के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे।
वाजपेयी का राजनीति में अनावरणÓ अगस्त 1942 में हुआ था जब भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें और उनके बड़े भाई को गिरफ्तार करके 23 दिनों के लिए जेल में डाल दिया गया। उन्हें जेल से तभी रिहा किया गया जब उन्होंने यह लिखकर दिया कि वह ब्रिटिश विरोधी संघर्ष में हिस्सा नहीं लेंगे। वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ के लिए काम करने के लिए आरएसएस ने दीनदयाल उपाध्याय के साथ वाजपेयी के नाम को आगे किया था। उत्तर क्षेत्र के लिए उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया था। 1954 में कश्मीर में गैर कश्मीरियों के साथ दुव्र्यवहार को लेकर मुखर्जी आमरण अनशन पर बैठे तो वाजपेयी भी उनके साथ थे। इस अनशन के दौरान मुखर्जी ने जेल में दम तोड़ दिया। 1957 में आम चुनावों में वाजपेयी मथुरा से राजा महेंद्र प्रताप से चुनाव हार गए। हालांकि, वह बलरामपुर से चुन लिए गए। उनकी बोलने की कला से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भविष्यवाणी कर दी कि वाजपेयी एक दिन देश के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे।
उनके भाषण देने की कला और संगठन कुशलता के कारण वह जल्द ही जनसंघ का चेहरा बन गए। दीनदयाल उपाध्याय की मौत के बाद जनसंघ की जिम्मेदारी युवा वाजपेयी के कंघों पर आ गई। वर्ष 1968 में उन्हें जनसंघ का अध्यक्ष चुन लिया गया। नाना देशमुख, एल के आडवाणी और बलराज मधोक के साथ मिलकर पार्टी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका दिलाई।
राजनैतिक करियर (1975-1995)
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 से 1977 देश में आपातकाल की घोषणा करने के चलते अटल बिहारी वाजपेयी को अन्य विपक्षी नेताओं के साथ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। 1977 में सामाजिक कार्यकर्ता जयप्रकाश नारायण ने सभी दलों को कांग्रेस के खिलाफ आने का आह्वान किया था जिसपर अमल करते हुए वाजपेयी ने जनसंघ को कांग्रेस के खिलाफ खड़े किए गए महागठन जनता पार्टी में विलय कर दिया। 1977 के आम चुनावों में जनता पार्टी को मिली जीत के बाद वाजपेयी को मोरारजी देसाई के कैबिनेट में विदेशमंत्री नियुक्त किया गया। उसी साल, संयुक्त राष्ट्रमहासभा में हिंदी में भाषण देने वाले वाजपेयी पहले व्यक्ति बन गए। हालांकि, 1979 में जनता पार्टी सरकार गिर गई। लेकिन तबतक वाजपेयी अपने आप को अनुभवी नेता साबित कर चुके थे।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 से 1977 देश में आपातकाल की घोषणा करने के चलते अटल बिहारी वाजपेयी को अन्य विपक्षी नेताओं के साथ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। 1977 में सामाजिक कार्यकर्ता जयप्रकाश नारायण ने सभी दलों को कांग्रेस के खिलाफ आने का आह्वान किया था जिसपर अमल करते हुए वाजपेयी ने जनसंघ को कांग्रेस के खिलाफ खड़े किए गए महागठन जनता पार्टी में विलय कर दिया। 1977 के आम चुनावों में जनता पार्टी को मिली जीत के बाद वाजपेयी को मोरारजी देसाई के कैबिनेट में विदेशमंत्री नियुक्त किया गया। उसी साल, संयुक्त राष्ट्रमहासभा में हिंदी में भाषण देने वाले वाजपेयी पहले व्यक्ति बन गए। हालांकि, 1979 में जनता पार्टी सरकार गिर गई। लेकिन तबतक वाजपेयी अपने आप को अनुभवी नेता साबित कर चुके थे।
1979 में देसाई द्वारा प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद जनता पार्टी को भंग कर दिया गया। हालांकि, वाजपेयी ने जनता पार्टी को संयुक्त रखने की काफी कोशिशें की, लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने पुराने सहयोगियों-आडवाणी, भैरोंसिंह शेखावत के साथ मिलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी को खड़ा किया। वह भाजपा के पहले अध्यक्ष बने। वाजपेयी, जनता पार्टी सरकार के बाद पुन: सत्ता में लौटी कांग्रेस के काफी मुखर विरोधी बनकर उभरे।
भाजपा ने ऑपरेशन ब्लूस्टार का खुलकर विरोध किया। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगों का भी पार्टी ने खुलकर विरोध किया। हालांकि, इसी साल हुए आम चुनावों में भाजपा को महज दो सीटें ही मिल पाईं। इस दौरान संसद में उन्होंने विपक्ष के नेता की भूमिका बखूबी निभाई। चुनावों में भाजपा को बड़ी सफलता 1995 में मिली जब वह गुजरात और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रही। यही नहीं, 1994 में कर्नाटक विभानसभा चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा, जिसके चलते वह राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
1995 में नंवबर में महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई हुई पार्टी की कार्यकारीणिी की बैठक में पार्टी अध्यक्ष एल के आडवाणी ने कहा कि वाजपेयी एक दिन देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। मई 1996 में हुए आम चुनावों में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में बनकर उभरी।
प्रधानमंत्री के रूप में
1996 से लेकर 2004 तक वाजपेयी तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे।
1996 से लेकर 2004 तक वाजपेयी तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे।
पहला कार्यकाल : मई 1996
1995 में भाजपा एक मजबूत पार्टी बनकर उभरी। मई 1996 के आम चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। देश के तत्कालीन राष्ट्रपति श्ंाकर दयाल शर्मा ने वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया। वाजपेयी को देश के दसवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई, लेकिन बहुमत नहीं जुटा पाने के चलते उन्होंने 13 दिनों के बाद इस्तीफा दे दिया।
1995 में भाजपा एक मजबूत पार्टी बनकर उभरी। मई 1996 के आम चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। देश के तत्कालीन राष्ट्रपति श्ंाकर दयाल शर्मा ने वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया। वाजपेयी को देश के दसवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई, लेकिन बहुमत नहीं जुटा पाने के चलते उन्होंने 13 दिनों के बाद इस्तीफा दे दिया।
दूसरा कार्यकाल : 1998-1999
1996 से लेकर 1998 तक देश में युनाइटेड फ्रंट की सरकार रही और इनके गिरने के बाद लोकसभा को भंग कर दिया गया और फिर से आम चुनाव करवाए गए। 1998 के चुनावों में भाजपा फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि, इस बार कई दल भाजपा के साथ आए और उन्होंने मिलकर नेशनल डेमोके्रटिक फ्रंट बनाया और वाजपेयी को फिर से देश के प्रधानमंंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। एनडीए संसद में बहुमत साबित करने में सफल रहा। हालांकि, यह सरकार भी 13 महीने ही चल पाई जब 1999 के मध्य सरकार को समर्थन दे रही जे जयललिता के नेतृत्व वाली एआईएडीएमके ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। 17 अप्रेल 1999 को हुआ विश्वास मत्र सरकार महज एक वोट से हार गई। राष्ट्रपति ने विपक्ष को सरकार बनाने का न्योता दिया, लेकिन आंकड़े नहीं जुटाने पाने के चलते लोकसभा को फिर से भंग कर दिया गया और चुनावों की घोषणा कर दी गई। तबतक वाजपेयी को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए कहा गया।
1996 से लेकर 1998 तक देश में युनाइटेड फ्रंट की सरकार रही और इनके गिरने के बाद लोकसभा को भंग कर दिया गया और फिर से आम चुनाव करवाए गए। 1998 के चुनावों में भाजपा फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि, इस बार कई दल भाजपा के साथ आए और उन्होंने मिलकर नेशनल डेमोके्रटिक फ्रंट बनाया और वाजपेयी को फिर से देश के प्रधानमंंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। एनडीए संसद में बहुमत साबित करने में सफल रहा। हालांकि, यह सरकार भी 13 महीने ही चल पाई जब 1999 के मध्य सरकार को समर्थन दे रही जे जयललिता के नेतृत्व वाली एआईएडीएमके ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। 17 अप्रेल 1999 को हुआ विश्वास मत्र सरकार महज एक वोट से हार गई। राष्ट्रपति ने विपक्ष को सरकार बनाने का न्योता दिया, लेकिन आंकड़े नहीं जुटाने पाने के चलते लोकसभा को फिर से भंग कर दिया गया और चुनावों की घोषणा कर दी गई। तबतक वाजपेयी को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए कहा गया।
तीसरा कार्यकाल : 1999-2004
करगिल युद्ध के बाद 1999 के आम चुनावों के आए नतीजों में 543 सीटों में से राजग 303 सीटें जीतने में कामयाब रहा। 13 अक्टूबर 1999 को वाजपेयी ने तीसरी बाद देश की बागडोर संभाली।
करगिल युद्ध के बाद 1999 के आम चुनावों के आए नतीजों में 543 सीटों में से राजग 303 सीटें जीतने में कामयाब रहा। 13 अक्टूबर 1999 को वाजपेयी ने तीसरी बाद देश की बागडोर संभाली।

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