कानपुर में लोग होली के कई दिन पहले से ही रंगों में सराबोर होने लगते हैं.
ऐसा नहीं है की मथुरा की तरह कानपुर के लोग भी होली से पहले ही विधिवत तरीके से होली खेलना शुरू कर देते हैं.
ऐसा नहीं है की मथुरा की तरह कानपुर के लोग भी होली से पहले ही विधिवत तरीके से होली खेलना शुरू कर देते हैं.
दरअसल बात ऐसी है कि उत्तर प्रदेश में रंग का सबसे बड़ा कारोबार हाथरस में है. उसके बाद कानपुर का ही स्थान आता है.
कानपुर के बीचों-बीच बसे जो पुराने मोहल्ले हैं, वहां पर जनवरी के महीने से ही रंग बनाने का काम एक कुटीर उद्योग की तरह शुरू हो जाता है.
होली में इस्तेमाल होने वाले रंग के कारोबारी ताराचंद जयसवाल कहते हैं, "रंग डाई से बनाया जाता है. पूरे भारत में डाई का केंद्र अहमदाबाद है. हम लोग डाई वहीं से खरीदते हैं. डाई की औसत क़ीमत एक हज़ार रूपये प्रति किलो होती है."
एक ड्रम में डाई और पानी मिलाया जाता है और फिर उसमें अरारोट या ग्लूकोज डाला जाता है. फिर उस घोल को धूप में कम से कम दो दिन तक सुखाया जाता है. घोल पाउडर की शक्ल ले लेता है. उस रंग को छन्नी से छान से साफ़ किया जाता है
कानपुर होली महोत्सव के महासचिव ज्ञानेंद्र विश्नोई कहते हैं, "पूरे उत्तर प्रदेश हाथरस के बाद कानपुर में होली के रंग का सबसे बड़ा कारोबार है. और कानपुर में रंगों की सबसे बड़ी मंडी हटिया है."
हटिया कानपुर का पुराना इलाका है. पतली सड़कें है और दोनों तरफ़ कई मंज़िलों की इमारतें.
विश्नोई कहते हैं, "हटिया के करीब करीब हर छत पर रंग बनाने का काम जनवरी
के महीने से ही शुरू हो जाता है. होली पास आते ही काम ज़ोर पकड़ लेता है.
छत पर रंग सूख रहा होता है और हवा चलने पर रंग उड़ कर घरों के अंदर चला
जाता है. ये सुखाने के लिए डाले गए गीले कपड़ों पर भी गिरता है. छतों पर ही
रंगों की पैकिंग होती है."
विश्नोई खुद भी हटिया में ही रहते हैं.
वो कई सालों से मांग कर रहे हैं कि रंग बनाने का काम हटिया और उसके आसपास के इलाकों में बंद किया जाए.
वो कहते हैं, "मेरी वजह से कुछ रंग कारखाने हटिया से बाहर गए हैं."
पर होली के साथ एक वाक्य भी जुड़ा है- बुरा न मानो होली है.
इसलिए कानपुर में अगर किसी के कपड़ों पर होली से पहले रंग पड़ भी जाता है तो वह बुरा नहीं मानता है.
कानपुर के बीचों-बीच बसे जो पुराने मोहल्ले हैं, वहां पर जनवरी के महीने से ही रंग बनाने का काम एक कुटीर उद्योग की तरह शुरू हो जाता है.
होली में इस्तेमाल होने वाले रंग के कारोबारी ताराचंद जयसवाल कहते हैं, "रंग डाई से बनाया जाता है. पूरे भारत में डाई का केंद्र अहमदाबाद है. हम लोग डाई वहीं से खरीदते हैं. डाई की औसत क़ीमत एक हज़ार रूपये प्रति किलो होती है."
एक ड्रम में डाई और पानी मिलाया जाता है और फिर उसमें अरारोट या ग्लूकोज डाला जाता है. फिर उस घोल को धूप में कम से कम दो दिन तक सुखाया जाता है. घोल पाउडर की शक्ल ले लेता है. उस रंग को छन्नी से छान से साफ़ किया जाता है
कानपुर होली महोत्सव के महासचिव ज्ञानेंद्र विश्नोई कहते हैं, "पूरे उत्तर प्रदेश हाथरस के बाद कानपुर में होली के रंग का सबसे बड़ा कारोबार है. और कानपुर में रंगों की सबसे बड़ी मंडी हटिया है."
हटिया कानपुर का पुराना इलाका है. पतली सड़कें है और दोनों तरफ़ कई मंज़िलों की इमारतें.
विश्नोई कहते हैं, "हटिया के करीब करीब हर छत पर रंग बनाने का काम जनवरी
के महीने से ही शुरू हो जाता है. होली पास आते ही काम ज़ोर पकड़ लेता है.
छत पर रंग सूख रहा होता है और हवा चलने पर रंग उड़ कर घरों के अंदर चला
जाता है. ये सुखाने के लिए डाले गए गीले कपड़ों पर भी गिरता है. छतों पर ही
रंगों की पैकिंग होती है."विश्नोई खुद भी हटिया में ही रहते हैं.
वो कई सालों से मांग कर रहे हैं कि रंग बनाने का काम हटिया और उसके आसपास के इलाकों में बंद किया जाए.
वो कहते हैं, "मेरी वजह से कुछ रंग कारखाने हटिया से बाहर गए हैं."
पर होली के साथ एक वाक्य भी जुड़ा है- बुरा न मानो होली है.
इसलिए कानपुर में अगर किसी के कपड़ों पर होली से पहले रंग पड़ भी जाता है तो वह बुरा नहीं मानता है.
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