महिलाओं पर बनी शानदार फिल्म है पिंक
इफ ए गर्ल से नो इट मीन्स नो… फिर चाहें वो आपकी गर्लफ्रेंड हो, आपकी पत्नी हो या फिर अपने जिस्म को सौदा करने वाली वेश्या.” ‘पिंक’, आपको बताने की कोशिश करती है कि औरत की अपनी एक सोच है और उसकी एक स्वतंत्रता है.जी हां, इस हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘पिंक’ रिलीज हो रही है. ये फिल्म एक कोर्टरूम ड्रामा है जहां चर्चा होती है एक लड़की चरित्र की. उसकी सीमाओं की, उसके दायरे की जहां समाज तय करेगा कि उसे कैसे रहना चाहिए, क्या पहनना चाहिए और किस तरह जीना चाहिए. ये एक संवेदनशील विषय है जिस पर सदियों से उंगलियां उठाई जा रही है. बदकिस्मती से ये चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है.शूजित सरकार की फिल्म ‘पिंक’ एक उलझी हुई परिस्थिति को साधारण तरीके व्यक्त करती है. आज इतने मॉडर्न जमाने में भी किस तरह से हर वक्त लड़कियों को समाज के कठघडे में खड़ा कर दिया जाता है.फिल्म की कहानी तीन इंडिपेंडेन्ट कामकाजी लड़कियों के इर्द-गिर्द घूमती है. मीनल (तापसी पन्नू), कीर्ति कुल्हारी और आंद्रे (आंद्रे तैरंग) रूममेट हैं जो एक दिन एक ऐसी परिस्थिति में फंस जाते हैं जो उनके चेहरे और जिंदगी का चैन छीन लेती है.ऐसे में एक रिटायर्ड वकिल सहगल (अमिताभ बच्चन) उनकी जिंदगी में आते हैं और भरी अदालत में किस तरह से उनके मान सम्मान पर कीचड़ उछालने वालों को अपने तर्क और फलसफों से मात देते हैं. ये है देखना दिलचस्प होगा पीयूष मिश्रा और अंगद बाली ने भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी है.‘पिंक’ में तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और आंद्रे तैरंग ने अपने किरदारों को बेहतरीन रंग दिया है और अमिताभ बच्चन एक बार फिर दर्शकों को एक बार फिर से शब्दबद्ध करेंगे. ये उनकी फिल्मी करियर का एक यादगार परफॉर्मेंस कहा जा सकता है. उन्होंने एक बार फिर से साबित कर किया है कि उम्र का अभिनय से कोई ताल्लुक नहीं है और उनके पिटारे में अभिनय के कई राज़ अभी भी बाकी है. ‘पिंक’ के साथ निर्माता रश्मी शर्मा ने ये जता दिया है कि टीवी के अलावा अब बड़े पर्दे पर भी वो अपना सिक्का जामाने को तैयार हैं.फिल्म में म्यूजिक की गुंजाइश ना होने के बावजूद शांतनु मोइत्रा ने बैकग्राउंड स्कोर में पूरा न्याय किया है. बंगाली फिल्मों के निर्देशक अनिरुद्ध की ये पहली फिल्म है और उन्हें ये दिखा दिया कि इस कोर्टरूम ड्रामा में बिना ड्रामा और डायलॉग्स के ओवरडोज के बिना एक कहानी को सरल तरीके से दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है.किसी भी फिल्म की स्टोरीटेलिंग सबसे अहम होती है. पहले हाफ में फिल्म के प्रेमिस को इस्टेबलिस करने में थोड़ा वक्त जरूर लगा लेकिन दूसरे हाफ में यानी इंटरवल के बाद फिल्म की कहानी पीछे मुड़ कर नहीं देखती है.
इफ ए गर्ल से नो इट मीन्स नो… फिर चाहें वो आपकी गर्लफ्रेंड हो, आपकी पत्नी हो या फिर अपने जिस्म को सौदा करने वाली वेश्या.” ‘पिंक’, आपको बताने की कोशिश करती है कि औरत की अपनी एक सोच है और उसकी एक स्वतंत्रता है.जी हां, इस हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘पिंक’ रिलीज हो रही है. ये फिल्म एक कोर्टरूम ड्रामा है जहां चर्चा होती है एक लड़की चरित्र की. उसकी सीमाओं की, उसके दायरे की जहां समाज तय करेगा कि उसे कैसे रहना चाहिए, क्या पहनना चाहिए और किस तरह जीना चाहिए. ये एक संवेदनशील विषय है जिस पर सदियों से उंगलियां उठाई जा रही है. बदकिस्मती से ये चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है.शूजित सरकार की फिल्म ‘पिंक’ एक उलझी हुई परिस्थिति को साधारण तरीके व्यक्त करती है. आज इतने मॉडर्न जमाने में भी किस तरह से हर वक्त लड़कियों को समाज के कठघडे में खड़ा कर दिया जाता है.फिल्म की कहानी तीन इंडिपेंडेन्ट कामकाजी लड़कियों के इर्द-गिर्द घूमती है. मीनल (तापसी पन्नू), कीर्ति कुल्हारी और आंद्रे (आंद्रे तैरंग) रूममेट हैं जो एक दिन एक ऐसी परिस्थिति में फंस जाते हैं जो उनके चेहरे और जिंदगी का चैन छीन लेती है.ऐसे में एक रिटायर्ड वकिल सहगल (अमिताभ बच्चन) उनकी जिंदगी में आते हैं और भरी अदालत में किस तरह से उनके मान सम्मान पर कीचड़ उछालने वालों को अपने तर्क और फलसफों से मात देते हैं. ये है देखना दिलचस्प होगा पीयूष मिश्रा और अंगद बाली ने भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी है.‘पिंक’ में तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और आंद्रे तैरंग ने अपने किरदारों को बेहतरीन रंग दिया है और अमिताभ बच्चन एक बार फिर दर्शकों को एक बार फिर से शब्दबद्ध करेंगे. ये उनकी फिल्मी करियर का एक यादगार परफॉर्मेंस कहा जा सकता है. उन्होंने एक बार फिर से साबित कर किया है कि उम्र का अभिनय से कोई ताल्लुक नहीं है और उनके पिटारे में अभिनय के कई राज़ अभी भी बाकी है. ‘पिंक’ के साथ निर्माता रश्मी शर्मा ने ये जता दिया है कि टीवी के अलावा अब बड़े पर्दे पर भी वो अपना सिक्का जामाने को तैयार हैं.फिल्म में म्यूजिक की गुंजाइश ना होने के बावजूद शांतनु मोइत्रा ने बैकग्राउंड स्कोर में पूरा न्याय किया है. बंगाली फिल्मों के निर्देशक अनिरुद्ध की ये पहली फिल्म है और उन्हें ये दिखा दिया कि इस कोर्टरूम ड्रामा में बिना ड्रामा और डायलॉग्स के ओवरडोज के बिना एक कहानी को सरल तरीके से दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है.किसी भी फिल्म की स्टोरीटेलिंग सबसे अहम होती है. पहले हाफ में फिल्म के प्रेमिस को इस्टेबलिस करने में थोड़ा वक्त जरूर लगा लेकिन दूसरे हाफ में यानी इंटरवल के बाद फिल्म की कहानी पीछे मुड़ कर नहीं देखती है.
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