Sunday, 14 August 2016

न्याय, स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के चार स्तंभों पर टिका है भारतीय लोकतंत्र : राष्ट्रपति

न्याय, स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के चार स्तंभों पर टिका है भारतीय लोकतंत्र : राष्ट्रपति

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने स्वतंत्रता की 69वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा कि न्याय, स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के चार स्तंभों पर निर्मित हमारा लोकतंत्र का सशक्त ढांचा आंतरिक और बाहरी अनेक जोखिम सहन कर भी मजबूती से आगे बढ़ रहा है।राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि महिलाओं और बच्चों को दी गई सुरक्षा और हिफाजत देश और समाज की खुशहाली सुनिश्चित करती है। एक महिला या बच्चे के प्रति हिंसा की प्रत्येक घटना सभ्यता की आत्मा पर घाव कर देती है। यदि हम इस कर्तव्य में विफल रहते हैं तो हम एक सभ्य समाज नहीं कहला सकते।देश में शांति भंग करने वाली आतंरिक ताकतों से सख्ती से निपटने की सलाह देते हुये राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि कुछ वर्षों से अशांत, विघटनकारी और असहिष्णु शक्तियां सिर उठा रही हैं। उन्होंने कहा कि कमजोर वर्गों पर हुए हमले पथभ्रष्टता का नतीज़ा है जिससे सख्ती से निपटने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हमारे समाज और शासनतंत्र की सामूहिक समझ को देखते हुए उन्हें यह विश्वास है कि ऐसे तत्त्वों को निष्क्रिय कर दिया जाएगा और भारत की शानदार विकास गाथा बिना रुकावट के आगे बढ़ती रहेगी।पिछड़े लोगों को विकास की प्रक्रिया में शामिल करने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि भारत तभी विकास करेगा, जब समूचा भारत विकास करेगा और इसके लिए पिछड़े लोगों को विकास की प्रक्रिया में शामिल करना होगा। आहत और भटके लोगों को मुख्यधारा में वापस लाना होगा।विविधता को सहेजने और अनेकता को महत्त्व देने पर बल देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि एक दूसरे की संस्कृतियों, मूल्यों और आस्थाओं के प्रति सम्मान ने ही भारत को एकता में बांध रखा है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के कथन को दोहराया जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘विभिन्न प्रकार के पंथों के बीच सहभावना आवश्यक है, यह देखना होगा कि वे साथ खड़े हों या एकसाथ गिरें, एक ऐसी सहभावना जो परस्पर सम्मान न कि अपमान, सद्भावना की अल्प अभिव्यक्ति को बनाए रखने से पैदा हो।’’भारत की विदेश नीति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हाल के समय में हमारी विदेश नीति में काफी सक्रियता दिखाई दी है। हमने अफ्रीका और एशिया प्रशांत के पारंपरिक साझीदारों के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को पुन: सशक्त किया है। हम सभी देशों, विशेषकर अपने निकटतम विस्तारित पड़ोस के साथ साझे मूल्यों और परस्पर लाभ पर आधारित नए रिश्ते स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं। हम अपनी ‘पड़ोस प्रथम नीति’ से पीछे नहीं हटेंगे। इतिहास, संस्कृति, सभ्यता और भूगोल के घनिष्ठ संबंध दक्षिण एशिया के लोगों को एक साझे भविष्य का निर्माण करने और समृद्धि की ओर मिलकर अग्रसर होने का विशेष अवसर प्रदान करते हैं। इस अवसर को बिना देरी किए हासिल करना होगा। विदेश नीति पर भारत का ध्यान शांत सह-अस्तित्व और इसके आर्थिक विकास के लिए प्रौद्योगिकी और संसाधनों के उपयोग पर केंद्रित होगा।

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