इरोम शर्मिला के फैसले से अचंभे में हैं परिवार और सहयोगी
आफ्सपा के खिलाफ 16 साल से जारी अपना अनशन अगले माह खत्म करने के मानवाधिकार कर्मी इरोम शर्मीला के अचानक किये फैसले ने उनके परिवार के सदस्यों और सहयोगियों से ले कर हर किसी को अचंभे में डाल दिया है.
पूरे संघर्ष में इरोम के साथ रहे उनके बड़े भाई सिंघजित ने कहा कि उन्हें इसका अंदाजा नहीं था कि वह अपना अनशन खत्म करने जा रही हैं.सिंघजित ने बताया, ‘‘अपनी खराब सेहत की वजह से पिछले कुछ दिनों से उनसे मेरी बात नहीं हो सकी है. मैंने उनके फैसले के बारे में दूसरे लोगों से सुना है.’’ गैर सरकारी संगठन ह्युमन राइट्स अलर्ट मणिपुर के निदेशक और इरोम के लंबे समय से सहयोगी बबलू लोइतोंगबाम ने कहा कि वह भी अचकचा गए, लेकिन वह उनके फैसले के पीछे का कारण समझ सकते हैं.लोइतोंगबाम ने कहा, ‘‘अगर उनके 15 साल के अनशन से आफ्सपा नहीं हटाया जा सका तो यह अगले 30 साल में भी अंजाम तक नहीं पहुंचेगा.’’ उन्होंने माना कि अनशन खत्म करने के इरोम के फैसले से वह अवगत नहीं थे.इरोम ने वर्ष 2000 में जब अपना अनशन शुरू किया था तो उन्होंने यह भी संकल्प लिया था कि जब तक सरकार सशस्त्र बल ( विशेष शक्ति) अधिनियम को खत्म नहीं करती, वह अपने घर में दाखिल नहीं होंगी और ना ही अपनी मां से मुलाकात करेंगी.उसके बाद से, वह अपनी मां सखी देवी से बस एक बार मिली जब दोनों एक ही अस्पताल में थीं. इरोम के भाई ने बताया कि भूख हड़ताल के शुरूआती दिनों में वह हमेशा उन्हें समझाने की कोशिश करते थे कि वह अपना अनशन खत्म कर दें.सिंघजित ने कहा, ‘‘लेकिन उन्होंने कभी मेरी बात नहीं सुनी. आखिरकार, मैंने उन्हें समझाना छोड़ दिया और वादा किया कि मैं उनके संघर्ष में हमेशा उनके साथ रहूंगा. वह कहा करती थीं कि वह बस तभी अपना अनशन खत्म करेंगी जब आफ्सपा हटाया जाएगा. यह उनका वादा था.’कोई भी यकीन से नहीं कह पा रहा है कि किन कारणों से इरोम ने यह फैसला किया. उनके सहयोगी कहते हैं कि उनके ब्रिटिश प्रेमी ने यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई कि वह अपना अनशन समाप्त कर दें. उनके एक अन्य सहयोगी ने बताया, ‘‘लेकिन साथ ही यह उनकी निराशा भी थी कि सरकार लोगों की मांगों पर कान नहीं धर रही है. इसलिए, वह रास्ता बदल रही हैं और आंदोलन से सियासत का रूख कर रही हैं. उनका लक्ष्य वही बरकरार है – आफ्सपा हटाना.’’
आफ्सपा के खिलाफ 16 साल से जारी अपना अनशन अगले माह खत्म करने के मानवाधिकार कर्मी इरोम शर्मीला के अचानक किये फैसले ने उनके परिवार के सदस्यों और सहयोगियों से ले कर हर किसी को अचंभे में डाल दिया है.
पूरे संघर्ष में इरोम के साथ रहे उनके बड़े भाई सिंघजित ने कहा कि उन्हें इसका अंदाजा नहीं था कि वह अपना अनशन खत्म करने जा रही हैं.सिंघजित ने बताया, ‘‘अपनी खराब सेहत की वजह से पिछले कुछ दिनों से उनसे मेरी बात नहीं हो सकी है. मैंने उनके फैसले के बारे में दूसरे लोगों से सुना है.’’ गैर सरकारी संगठन ह्युमन राइट्स अलर्ट मणिपुर के निदेशक और इरोम के लंबे समय से सहयोगी बबलू लोइतोंगबाम ने कहा कि वह भी अचकचा गए, लेकिन वह उनके फैसले के पीछे का कारण समझ सकते हैं.लोइतोंगबाम ने कहा, ‘‘अगर उनके 15 साल के अनशन से आफ्सपा नहीं हटाया जा सका तो यह अगले 30 साल में भी अंजाम तक नहीं पहुंचेगा.’’ उन्होंने माना कि अनशन खत्म करने के इरोम के फैसले से वह अवगत नहीं थे.इरोम ने वर्ष 2000 में जब अपना अनशन शुरू किया था तो उन्होंने यह भी संकल्प लिया था कि जब तक सरकार सशस्त्र बल ( विशेष शक्ति) अधिनियम को खत्म नहीं करती, वह अपने घर में दाखिल नहीं होंगी और ना ही अपनी मां से मुलाकात करेंगी.उसके बाद से, वह अपनी मां सखी देवी से बस एक बार मिली जब दोनों एक ही अस्पताल में थीं. इरोम के भाई ने बताया कि भूख हड़ताल के शुरूआती दिनों में वह हमेशा उन्हें समझाने की कोशिश करते थे कि वह अपना अनशन खत्म कर दें.सिंघजित ने कहा, ‘‘लेकिन उन्होंने कभी मेरी बात नहीं सुनी. आखिरकार, मैंने उन्हें समझाना छोड़ दिया और वादा किया कि मैं उनके संघर्ष में हमेशा उनके साथ रहूंगा. वह कहा करती थीं कि वह बस तभी अपना अनशन खत्म करेंगी जब आफ्सपा हटाया जाएगा. यह उनका वादा था.’कोई भी यकीन से नहीं कह पा रहा है कि किन कारणों से इरोम ने यह फैसला किया. उनके सहयोगी कहते हैं कि उनके ब्रिटिश प्रेमी ने यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई कि वह अपना अनशन समाप्त कर दें. उनके एक अन्य सहयोगी ने बताया, ‘‘लेकिन साथ ही यह उनकी निराशा भी थी कि सरकार लोगों की मांगों पर कान नहीं धर रही है. इसलिए, वह रास्ता बदल रही हैं और आंदोलन से सियासत का रूख कर रही हैं. उनका लक्ष्य वही बरकरार है – आफ्सपा हटाना.’’

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