क्या अब मोटी तनख्वाहों के बाद काम करेंगे सरकारी बाबू? आर.के.सिन्हा
अब बहुत जल्दी ही केन्द्र सरकार के बाबुओं की जेबें भरने वाली हैं। उनके वेतन में तगड़ा इजाफा हुआ है। सातवें वेतन आयोग ने मुलाजिमों के मूल वेतन में तगड़ा इजाफा किया है। सातवें वेतन आयोग की रपट के मुताबिक, सरकार में न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति महीना हो रहा है। सर्वोच्च पद के लिए अधिकतम वेतन 2.25 लाख रुपये और कैबिनेट सचिव और समान स्तर के अन्य पदों के लिए 2.50 लाख रुपये प्रति महीना होगा। साफ है कि सरकारी बाबू मजे में रहेंगे।वेतन वृद्धि के ऐलान के बाद 50 लाख सरकारी कर्मचारी और 58 लाख पेंशनधारियों के हाथों में ज्यादा पैसा आएगा। केन्द्र सरकार के बाबुओं के बाद राज्य सरकारों में काम करने वाले बाबुओं को भी लाभ मिलेगा। इन्हें बेहतर पगार मिले और इन्हें बाकी भी सुविधाएं मिलें इसमें किसी को कोई एतराज क्यों होगा? लेकिन अब बड़ा सवाल ये है कि क्या अब सरकारी दफ्तरों में काहिली और करप्शन खत्म होगी? क्या वेतन में वृद्धि के साथ इन बाबुओं की जवाबदेही को भी सरकार बढ़ाने जा रही है? अधिकार और कर्तव्य तो साथ-साथ चलें तो ही मजा आता है। ताजा स्थिति ये है कि बाबू अधिकार तो ले रहे हैं, पर कर्तव्यों के मोर्चे पर उस तरह से सक्षम साबित नहीं हो रहे। कोशिश भी नहीं कर रहे। आप किसी भी सरकारी दफ्तर में चले जाइये आपको सूरते हाल पहले वाले ही मिलेंगे। सवालों के जवाब टालू अँदाज में दिए जाएंगे। वहां पर सारा माहौल बेहद बोझिल लगेगा। बाबू इस अँदाज में बैठे होते हैं मानो उन्हें कोई सजा दी जा रही है। काम को करने को लेकर किसी तरह का विशेष आग्रह या उत्साह नहीं दिखता।केन्द्र में सत्तासीन होने के बाद मोदी सरकार ने सरकारी दफ्तरों में बैठे कर्मचारियों पर नजर रखने का फैसला किया था। तब कहा गया था कि सरकार अब उनके आने-जाने के समय और उनके काम पर नजर रखेगी। यदि सरकार को किसी कर्मचारी के काम में किसी भी प्रकार की लापरवाही नजर आई तो उसकी छुट्टी कर दी जाएगी। अब मालूम नहीं कि इन कदमों को उठाने से कितना लाभ हुआ पर अब भी पब्लिक डीलिंग करने वाले सरकारी दफ्तरों के कामकाज में कोई खास सुधार देखने में नहीं आ रहा। हैरानी होती है कि वेतन आयोग की भारी भरकम सिफारिशों को लागू करने के सरकार के फैसले के बाद भी केन्द्रीय कर्मियों की मजदूर यूनियनों ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी थी। इनका कहना था कि इन्हें उम्मीद के मुताबिक बढ़ा हुआ वेतन नहीं मिल रहा। पर इन्होंने अपनी हड़ताल वापस भी ले ली। लेकिन इन्होंने कभी अपनी यूनियन से जुड़े बाबुओं से इस बात का आग्रह तक नहीं किया कि वे अपने काम को लेकर भी तनिक गंभीरता बरतें। क्यों? यानी सिर्फ पंजीरी खाएंगे सरकारी बाबू।बेशक, ये कहना भी सर्वथा अनुचित होगा कि सभी सरकारी कर्मचारी निकम्मे हैं। बहुत से सरकारी कर्मी मेहनत भी करते हैं। लेकिन, कुल मिलाकर हालात गंभीर है । आपको लगातार सरकारी बाबुओं के घूस लेते पकड़े जाने के समाचार पढ़ने-देखने को मिलेंगे। यानी मोटी पगार के बाद भी उपरी कमाई की प्यास बुझ ही नहीं रही है।
अब बहुत जल्दी ही केन्द्र सरकार के बाबुओं की जेबें भरने वाली हैं। उनके वेतन में तगड़ा इजाफा हुआ है। सातवें वेतन आयोग ने मुलाजिमों के मूल वेतन में तगड़ा इजाफा किया है। सातवें वेतन आयोग की रपट के मुताबिक, सरकार में न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति महीना हो रहा है। सर्वोच्च पद के लिए अधिकतम वेतन 2.25 लाख रुपये और कैबिनेट सचिव और समान स्तर के अन्य पदों के लिए 2.50 लाख रुपये प्रति महीना होगा। साफ है कि सरकारी बाबू मजे में रहेंगे।वेतन वृद्धि के ऐलान के बाद 50 लाख सरकारी कर्मचारी और 58 लाख पेंशनधारियों के हाथों में ज्यादा पैसा आएगा। केन्द्र सरकार के बाबुओं के बाद राज्य सरकारों में काम करने वाले बाबुओं को भी लाभ मिलेगा। इन्हें बेहतर पगार मिले और इन्हें बाकी भी सुविधाएं मिलें इसमें किसी को कोई एतराज क्यों होगा? लेकिन अब बड़ा सवाल ये है कि क्या अब सरकारी दफ्तरों में काहिली और करप्शन खत्म होगी? क्या वेतन में वृद्धि के साथ इन बाबुओं की जवाबदेही को भी सरकार बढ़ाने जा रही है? अधिकार और कर्तव्य तो साथ-साथ चलें तो ही मजा आता है। ताजा स्थिति ये है कि बाबू अधिकार तो ले रहे हैं, पर कर्तव्यों के मोर्चे पर उस तरह से सक्षम साबित नहीं हो रहे। कोशिश भी नहीं कर रहे। आप किसी भी सरकारी दफ्तर में चले जाइये आपको सूरते हाल पहले वाले ही मिलेंगे। सवालों के जवाब टालू अँदाज में दिए जाएंगे। वहां पर सारा माहौल बेहद बोझिल लगेगा। बाबू इस अँदाज में बैठे होते हैं मानो उन्हें कोई सजा दी जा रही है। काम को करने को लेकर किसी तरह का विशेष आग्रह या उत्साह नहीं दिखता।केन्द्र में सत्तासीन होने के बाद मोदी सरकार ने सरकारी दफ्तरों में बैठे कर्मचारियों पर नजर रखने का फैसला किया था। तब कहा गया था कि सरकार अब उनके आने-जाने के समय और उनके काम पर नजर रखेगी। यदि सरकार को किसी कर्मचारी के काम में किसी भी प्रकार की लापरवाही नजर आई तो उसकी छुट्टी कर दी जाएगी। अब मालूम नहीं कि इन कदमों को उठाने से कितना लाभ हुआ पर अब भी पब्लिक डीलिंग करने वाले सरकारी दफ्तरों के कामकाज में कोई खास सुधार देखने में नहीं आ रहा। हैरानी होती है कि वेतन आयोग की भारी भरकम सिफारिशों को लागू करने के सरकार के फैसले के बाद भी केन्द्रीय कर्मियों की मजदूर यूनियनों ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी थी। इनका कहना था कि इन्हें उम्मीद के मुताबिक बढ़ा हुआ वेतन नहीं मिल रहा। पर इन्होंने अपनी हड़ताल वापस भी ले ली। लेकिन इन्होंने कभी अपनी यूनियन से जुड़े बाबुओं से इस बात का आग्रह तक नहीं किया कि वे अपने काम को लेकर भी तनिक गंभीरता बरतें। क्यों? यानी सिर्फ पंजीरी खाएंगे सरकारी बाबू।बेशक, ये कहना भी सर्वथा अनुचित होगा कि सभी सरकारी कर्मचारी निकम्मे हैं। बहुत से सरकारी कर्मी मेहनत भी करते हैं। लेकिन, कुल मिलाकर हालात गंभीर है । आपको लगातार सरकारी बाबुओं के घूस लेते पकड़े जाने के समाचार पढ़ने-देखने को मिलेंगे। यानी मोटी पगार के बाद भी उपरी कमाई की प्यास बुझ ही नहीं रही है।

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