Friday, 20 November 2015

सिख दंगों को सही ठहराने वाले राजीव गांधी भारत रत्न के हकदार नहीं!

सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों के लिए काम कर रहे आप नेता एच एस फुलका ने गुरुवार को मांग की कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों में बेगुनाह सिखों की हत्याओं को जायज ठहराया था इसलिए उनका भारत रत्न सम्मान वापस लिया जाना चाहिए। कांग्रेस ने इस मांग को सस्ती राजनीति कहकर खारिज कर दिया।फुलका ने जिस संवाददाता सम्मेलन में यह मांग उठाई, उसमें उनके साथ भाजपा सचिव आर पी सिंह भी मौजूद थे। दोनों नेताओं ने 1984 में इंदिरा गांधी की जयंती पर बोट क्लब में दिये गये राजीव के भाषण का वीडियो भी जारी किया जिसमें उन्होंने कहा था, ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।’ इस बयान को 1984 के सिख विरोधी दंगों से जोड़कर देखा गया। वकील फुलका ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘जो प्रधानमंत्री बेगुनाह नागरिकों की हत्या को जायज ठहराता है, वह निश्चित रूप से भारत रत्न का हकदार नहीं है। इसलिए हम सरकार से राजीव गांधी को प्रदान किये गये भारत रत्न सम्मान को वापस लेने की मांग करते हैं।’उन्होंने 84 के नरसंहार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा, ‘जिस प्रधानमंत्री को राजधानी में दिनदहाड़े मारे गये बेगुनाह नागरिकों के शव गिनने में ही तीन साल लग जाते हैं, वह भारत रत्न नहीं हो सकता।’ भाजपा नेता सिंह और फुलका ने कहा कि भाषण का वीडियो हासिल करना मुश्किल था क्योंकि इसे रिकार्ड से और दूरदर्शन के अभिलेखागार से हटा दिया गया था। आप के सभी पदों से इस्तीफा दे चुके और केवल पार्टी सदस्य के रूप में काम कर रहे फुलका ने एक भाजपा नेता के साथ मंच साझा करने के सवाल पर कहा कि कई दलों के नेताओं ने उनकी मदद की है।जाब के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अमरिंदर सिंह ने भी फुलका की दलील को खारिज करते हुए कहा कि वह इस मांग को गंभीरता से नहीं लेते।उन्होंने कहा, ‘वह खबरों में रहने के लिए पिछले 31 साल से इस तरह की चीजें उठा रहे हैं।’ हालांकि भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि सभी को लोकतंत्र में अपनी बात रखने का अधिकार है। फुलका के साथ भाजपा के एक नेता के मौजूद रहने के संबंध में हुसैन ने कहा कि वह भी उसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिसके हजारों सदस्य बिना किसी गुनाह के मारे गये थे। हुसैन ने राजीव गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि देश को उनका बयान याद है और लोग सहिष्णुता तथा असहिष्णुता पर बहस में उनके बयानों का हवाला देते हैं।

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